नल-जल योजना में भारी गड़बड़ी के आरोप, सिहोरा–मझौली में लीपापोती! कागजों में पूर्ण, ज़मीन पर अधूरा काम; अनुभवहीन इंजीनियर और ठेकेदारों की मिलीभगत का आरोप
सिहोरा
प्रदेश के हर घर तक नल से शुद्ध पेयजल पहुंचाने की महत्वाकांक्षी योजना सिहोरा और मझौली विकासखंडों में भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। आरोप है कि मप्र लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचई) के अनुभवहीन इंजीनियरों द्वारा गुणवत्ताहीन और गैर-तकनीकी तरीके से कार्य कराए जा रहे हैं, जिन्हें कागजों में पूर्ण दर्शाकर शासन के करोड़ों रुपये की लीपापोती की जा रही है। सूत्रों के अनुसार दोनों विकासखंडों में पाइपलाइन बिछाने के कार्यों में वास्तविक खुदाई की तुलना में माप पुस्तिका (एमबी) में बढ़-चढ़कर खुदाई दर्शाई गई, जिससे ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया। स्वीकृत कार्यों और पूर्व में किए गए कार्यों में तकनीकी समानता तक नहीं पाई जा रही। गंभीर आरोप यह भी हैं कि सिहोरा उपखंड में पदस्थ सहायक यंत्री और उपयंत्री अधिकांश समय जबलपुर में निवास करते हैं और सप्ताह में केवल एक-दो दिन ही कार्यालय आते हैं। शासकीय वाहन का उपयोग निजी कार्यों में होने से हर माह 50 से 60 हजार रुपये के डीजल खर्च का आरोप है। ग्रामीण जब समस्या लेकर कार्यालय पहुंचते हैं तो वहां अधिकारी नहीं, बल्कि चपरासी या सहायक कर्मी ही मिलते हैं। सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि पाइपलाइन कार्यों की मेजरमेंट संविदा सहायक केमिस्ट द्वारा ली जा रही है और वही माप पुस्तिका में दर्ज भी की जा रही है, जबकि नियमों के अनुसार यह अधिकार केवल उपयंत्री को है। इससे उपयंत्री और सहायक केमिस्ट की संभावित मिलीभगत पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। अब देखना यह है कि शासन और वरिष्ठ अधिकारी इन गंभीर आरोपों की जांच कर दोषियों पर क्या कार्रवाई करते हैं।
इनका कहना
नल जल योजना के तहत जो भी कार्य हो रहे हैं उनका समय-समय पर ओपीनियनरी निरीक्षण करते हैं और कार्य पूर्ण होने के बाद ही एनओसी दी जाती है। मेजरमेंट के बाद एमबी रिपोर्ट भरने का काम उपयंत्री है जिसे उपयंत्री ही करते हैं कोई अन्य नहीं।
विनय प्रताप सिंह, एसडीओ पीएचई सिहोरा