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नरभक्षी दरिंदे ने युवक का सिर कुचलकर खून पिया और मांस खाया

06 Mar 2026 | JAY SHANKAR PANDEY | 188 views
नरभक्षी दरिंदे ने युवक का सिर कुचलकर खून पिया और मांस खाया


दमोह में रूह कंपा देने वाली वारदात


Weenews ....भाई दूज का पवित्र दिन जब बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं दमोह जिले के समन्ना गांव में एक बहन का इंतजार हमेशा के लिए अधूरा रह गया। इमलिया चौकी क्षेत्र के अर्थखेड़ा गांव का 19 वर्षीय नौजवान भरत विश्वकर्मा बड़े चाव से अपनी बहन से टीका लगवाने उसके घर समन्ना जा रहा था। उस मासूम को क्या पता था कि रास्ते में मौत एक अघोरी और नरभक्षी का रूप धारण किए घात लगाए बैठी है। यह कोई साधारण हत्या का मामला नहीं है बल्कि एक ऐसी पैशाचिक बर्बरता की दास्तान है जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया है और पूरे इलाके में खौफ का माहौल पैदा कर दिया है।

भरत अपने चचेरे भाई विजय विश्वकर्मा के साथ मोटरसाइकिल पर सवार होकर समन्ना गांव पहुंचा ही था कि अचानक पड़ोस में रहने वाला गुड्डा पटेल उनके सामने काल बनकर आ खड़ा हुआ। चश्मदीद गवाह विजय ने पुलिस को बताया कि गुड्डा ने रास्ते में अचानक आकर सबसे पहले एक भारी लोहे के सरिए से भरत पर जोरदार वार किया। इस अप्रत्याशित हमले से भरत अनियंत्रित होकर अपनी बाइक से जमीन पर गिर पड़ा। इससे पहले कि भरत संभल कर उठ पाता या कोई बचाव कर पाता उस दरिंदे ने अपने हाथ में रखा भारी हथौड़ा उठाया और भरत के सिर पर लगातार 20 से 25 बार ताबड़तोड़ प्रहार किए। खून से लथपथ मंजर देखकर खौफजदा विजय अपनी जान बचाकर गांव की तरफ भागा और ग्रामीणों को इस खौफनाक वारदात की जानकारी दी।

जब तक ग्रामीण भागकर मौके पर पहुंचते गुड्डा पटेल एक वहशी दरिंदे और नरभक्षी में तब्दील हो चुका था। जो नजारा गांव वालों ने देखा वह किसी भी इंसान का दिल दहला देने के लिए काफी था। वह भरत के बुरी तरह कुचले हुए सिर से रिसता हुआ खून पी रहा था और उसके शरीर का मांस नोचकर खा रहा था। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक आरोपी का व्यवहार पूरी तरह से एक आदमखोर जानवर जैसा हो गया था। ग्रामीणों ने किसी तरह भारी हिम्मत जुटाकर चारों तरफ से घेराबंदी की और उस खूंखार हैवान को दबोच कर पुलिस के हवाले कर दिया। पड़ोसियों और गांव वालों ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। उनके मुताबिक यह आदमी अक्सर आधी रात को श्मशान घाट जाता था वहां से चिता की जली हुई राख और मरे हुए लोगों की हड्डियां लेकर आता था और अपने घर में तंत्र विद्या तथा टोना टोटका जैसी काली ताकतों की पूजा में लगा रहता था।

इस पूरी खौफनाक वारदात का सबसे स्याह और चिंताजनक पहलू यह है कि आरोपी गुड्डा पटेल कोई नया या मामूली अपराधी नहीं है। साल 2008 में इसी शख्स ने अपनी पत्नी की बेहद बेरहमी से हत्या कर दी थी। अदालत ने उसे उस जुर्म में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। वह 14 साल की लंबी सजा काटकर महज एक साल पहले ही जेल की सलाखों से बाहर आया था। विडंबना देखिए कि इस पैशाचिक घटना से ठीक 10 दिन पहले ही इस हत्यारे के बेटे की धूमधाम से शादी हुई थी और वारदात के वक्त उसका बेटा अपनी नई नवेली पत्नी को विदा कराने अपनी ससुराल गया हुआ था।


इस जघन्य और अमानवीय अपराध ने हमारी न्याय प्रणाली और जेल प्रशासन की रिहाई नीति पर एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या केवल 14 साल जेल की चारदीवारी के पीछे बिताने भर से एक खूंखार हत्यारा समाज के बीच बेखौफ घूमने के लायक हो जाता है। दुनिया के कई विकसित देशों में किसी भी सजायाफ्ता कैदी की रिहाई से पहले उसका बहुत कड़ा मनोवैज्ञानिक परीक्षण किया जाता है।

उदाहरण के लिए नॉर्वे का कानून देखें तो वहां यदि सजा पूरी होने के बाद भी मनोवैज्ञानिक और मेडिकल रिपोर्ट यह साबित करती है कि अपराधी की मानसिक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है तो वहां की अदालत उसकी कैद को हर 5 साल के लिए आगे बढ़ा सकती है। उनका स्पष्ट लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी हिंसक प्रवृत्ति का इंसान तब तक खुली हवा में सांस न ले जब तक वह समाज के लिए पूरी तरह सुरक्षित न मान लिया जाए।

इसी तरह अमेरिका के कई प्रमुख राज्यों में यौन और हिंसक अपराधियों के लिए विशेष और सख्त कानून लागू हैं। सजा की कानूनी अवधि खत्म होने के बाद भी यदि अपराधी में कोई मानसिक विकार या हिंसक प्रवृत्ति पाई जाती है तो उसे सीधे जेल से निकाल कर किसी कड़ी सुरक्षा वाले मानसिक स्वास्थ्य केंद्र में भेज दिया जाता है। उसे आम जनता के बीच तब तक वापस नहीं भेजा जाता जब तक कि विशेषज्ञ डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक उसे पूरी तरह से सुरक्षित घोषित न कर दें।


आखिर भारत में ऐसी कोई ठोस मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन नीति क्यों लागू नहीं है। अगर पत्नी की हत्या करने वाले गुड्डा पटेल की जेल से रिहाई के वक्त उसकी मानसिक स्थिति और उसकी तंत्र मंत्र वाली हिंसक प्रवृत्तियों का बारीकी से परीक्षण किया गया होता तो शायद आज 19 साल के मासूम भरत विश्वकर्मा की बेरहमी से जान नहीं जाती। यह व्यवस्था की वह बड़ी और जानलेवा चूक है जिसकी कीमत आज एक बेगुनाह परिवार को अपने जवान बेटे की बलि देकर चुकानी पड़ी है।

JAY SHANKAR PANDEY
JAY SHANKAR PANDEY

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