पुणे । पुणे में सिम्बायोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के 22वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि दुनिया की आर्थिक और राजनीतिक शक्ति का क्रम पूरी तरह बदल चुका है और अब वैश्विक मंच पर एक नहीं बल्कि कई केंद्र उभर चुके हैं, जहां से प्रभाव और ताकत संचालित हो रही है, ऐसे में कोई भी देश चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो,
हर मुद्दे पर अपनी इच्छा दूसरे देशों पर नहीं थोप सकता; उन्होंने कहा कि अमेरिका से संवाद पहले से कहीं अधिक जटिल हो गया है, चीन से निपटना ज्यादा पेचीदा है और यूक्रेन युद्ध के कारण रूस को लेकर भी दबाव की स्थिति बनी हुई है, जयशंकर ने स्पष्ट किया कि आज की दुनिया एकध्रुवीय नहीं बल्कि बहुध्रुवीय है, जहां शक्ति की परिभाषा केवल सैन्य बल तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, प्राकृतिक संसाधन और मानव प्रतिभा भी इसका हिस्सा हैं; उन्होंने यूरोप को भारत का अहम साझेदार बताते हुए कहा कि पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक है,
बावजूद इसके संकट के समय भारत ने हमेशा मदद की है—चाहे श्रीलंका में चक्रवात हो, कोविड काल में वैक्सीन आपूर्ति हो या यूक्रेन युद्ध के दौरान आवश्यक वस्तुओं की कमी; खाड़ी देशों के दौरे का जिक्र करते हुए जयशंकर ने भारत और खाड़ी के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित किया और युवाओं से अपील की कि वे खाड़ी, दक्षिण-पूर्व एशिया, हिंद महासागर क्षेत्र और मध्य एशिया में भारत की गहरी छाप को समझें, साथ ही विदेश नीति में स्पष्ट रणनीति और ठोस गेम प्लान के साथ भारत के हितों को आगे बढ़ाने पर जोर दिया।