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तालाबों में खिली आत्मनिर्भरता की उम्मीद : मखाना की खेती से बदल रही ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी

28 Oct 2026 | WEENEWS DESK | 1019 views
तालाबों में खिली आत्मनिर्भरता की उम्मीद : मखाना की खेती से बदल रही ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी

रायपुर: राज्य में ग्रामीण महिलाओं की मेहनत और आत्मनिर्भर बनने का संकल्प अब खेती के नए क्षेत्रों में भी दिखाई देने लगा है। धमतरी जिले के तालाबों में शुरू हुई मखाना की खेती महिलाओं के लिए आर्थिक सशक्तिकरण की नई उम्मीद बनकर उभरी है। कभी पारंपरिक खेती और घरेलू कामकाज तक सीमित रहने वाली ग्रामीण महिलाएं अब मखाना उत्पादन, संग्रहण और प्रसंस्करण के जरिए अपनी अलग पहचान बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। जिले के ग्राम छाती और डांडेसरा में महिला स्व-सहायता समूहों द्वारा 29 एकड़ में उत्पादित मखाना का संग्रहण शुरू होना इसी बदलाव की महत्वपूर्ण कड़ी है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में प्रदेश में कृषि विविधीकरण और ग्रामीण आजीविका को बढ़ावा देने के प्रयासों के बीच धमतरी जिले में मखाना की खेती को नया विस्तार मिल रहा है। केंद्र सरकार की सेंट्रल सेक्टर स्कीम फॉर डेवलपमेंट ऑफ मखाना के अंतर्गत वर्ष 2025-26 में जिले को 165 एकड़ में मखाना उत्पादन का लक्ष्य मिला था। इसके विरुद्ध जिला प्रशासन और उद्यानिकी विभाग के मार्गदर्शन में 105 एकड़ क्षेत्र में खेती शुरू की गई है। ग्राम राखी, छाती, डांडेसरा, पीपरछेड़ी और नगरी विकासखंड के सांकरा में मखाना उत्पादन को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

ग्राम छाती और डांडेसरा की शैलपुत्री एवं नई किरण महिला स्व-सहायता समूह की सदस्य इस पहल से जुड़कर आजीविका के नए अवसर तलाश रही हैं। तालाबों में तैयार मखाना की फसल का संग्रहण शुरू होने से महिलाओं में उत्साह है। उन्हें उम्मीद है कि उत्पादन के साथ प्रसंस्करण और बाजार की सुविधाएं मिलने से यह खेती उनकी नियमित आमदनी का बेहतर जरिया बन सकेगी। महिलाओं को तकनीकी रूप से दक्ष बनाने के लिए 26 अक्टूबर 2026 को मखाना संग्रहण की शुरुआत के साथ प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया।

मखाना की खेती में उत्पादन के साथ उसकी सही कटाई, सफाई और प्रसंस्करण भी महत्वपूर्ण है। तालाबों से मखाना के बीज निकालने की प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होती है। पहली कटाई को लहसर कहा जाता है, जिसमें लगभग 70 प्रतिशत बीज निकाले जाते हैं। इसके बाद मरकट और कर्कट चरणों में शेष बीजों का संग्रहण किया जाता है। संग्रहित बीजों को साफ कर धूप में सुखाया जाता है। इसके बाद निर्धारित तकनीक से भुनाई और बीजों को फोड़ने की प्रक्रिया पूरी की जाती है, जिससे सफेद और कुरकुरा मखाना तैयार होता है। इसे लावा कहा जाता है। उचित प्रसंस्करण से उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखने और बाजार में बेहतर मूल्य प्राप्त करने की संभावनाएं बढ़ती हैं।

उप संचालक उद्यानिकी ने बताया कि महिला स्व-सहायता समूहों को आगामी दिनों में कृषि विज्ञान केंद्र, धमतरी में मखाना के कटाई-पश्चात प्रबंधन का वैज्ञानिक प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे महिलाएं उत्पादन के साथ प्रसंस्करण और गुणवत्ता प्रबंधन की तकनीक सीख सकेंगी तथा मखाना को स्वरोजगार के रूप में विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ेंगी।

कलेक्टर धमतरी ने कहा कि जिले में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग करते हुए किसानों की आय बढ़ाने और महिला स्व-सहायता समूहों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं। मखाना की खेती इस दिशा में एक अच्छा विकल्प बन सकती है। उन्होंने कहा कि उत्पादन के साथ वैज्ञानिक तकनीक, प्रसंस्करण, गुणवत्ता और बाजार से जुड़ाव पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, ताकि ग्रामीण महिलाओं को इसका अधिक से अधिक लाभ मिल सके।

धमतरी जिले में मखाना उत्पादन की यह शुरुआत केवल एक नई फसल की खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बढ़ता कदम भी है। तालाबों में तैयार हो रही मखाना की फसल के साथ महिलाओं के मन में बेहतर भविष्य की उम्मीद भी आकार ले रही है। आने वाले समय में वैज्ञानिक प्रशिक्षण, गुणवत्तापूर्ण प्रसंस्करण और बाजार से बेहतर जुड़ाव मिलने पर यह पहल महिला उद्यमिता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दे सकती है।


WEENEWS DESK
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