प्रशासनिक मनमानी और निजता हनन का गंभीर मामला
रायपुर। रायपुर स्थित छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य सेवाएँ संचालनालय में पदस्थ एक महिला कर्मचारी ने अपने ही विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर गरिमा हनन और प्रशासनिक अधिकारों के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 को सामने आई विस्तृत शिकायत के अनुसार, संचालनालय के संचालक संजीव झा, संयुक्त संचालक प्रेमलता चंदेल और डॉ. निधि अत्रिवाल ने एक व्यक्तिगत विवाद की आड़ में महिला कर्मचारी पर अनुचित दबाव बनाया और उसकी नाबालिग बेटी के जन्म संबंधी निजी अभिलेखों का गलत इस्तेमाल किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए पीड़िता ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO), मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और राष्ट्रीय आयोगों से इस पूरे प्रकरण की प्रभाव-मुक्त जाँच की मांग करते हुए कड़ी कार्रवाई की गुहार लगाई है।
कार्यालय में स्पष्टीकरण के नाम पर आपत्तिजनक टिप्पणियां
शिकायत के दस्तावेजों के अनुसार, महिला कर्मचारी को एक पारिवारिक विवाद से जुड़े आरोपों को लेकर कार्यालय में उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देने के लिए बाध्य किया गया। आरोप है कि इस प्रशासनिक प्रक्रिया के दौरान अधिकारियों द्वारा उसके चरित्र और उसकी नाबालिग पुत्री को लेकर सीधे तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं। महिला ने अपनी शिकायत में इस पूरी कार्रवाई के औचित्य और अपनाई गई प्रक्रिया पर सवाल उठाया है। उसका कहना है कि बिना किसी आधिकारिक विभागीय शिकायत के, केवल व्यक्तिगत मामलों को लेकर कार्यालय में तलब करना और स्पष्टीकरण मांगना सीधे तौर पर मानसिक उत्पीड़न और प्रशासनिक अधिकारों का अतिक्रमण है।
बिना अनुमति निकाली गई नाबालिग की निजी जानकारी
मामले का सबसे संवेदनशील हिस्सा नाबालिग की निजता के हनन से जुड़ा है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि उसकी पुत्री के जन्म प्रमाणपत्र और उसमें सुधार के लिए जमा किए गए गोपनीय दस्तावेजों को अधिकारियों ने अनुचित तरीके से प्राप्त किया। इन अभिलेखों का इस्तेमाल विवादित आरोपों को साबित करने या दबाव बनाने के लिए किया गया। यह अभी साफ नहीं है कि ये गोपनीय अभिलेख अधिकारियों तक कैसे पहुंचे, किस नियम के तहत इन्हें निकाला गया और क्या इन्हें अनावश्यक रूप से बाहरी व्यक्तियों के साथ साझा भी किया गया। महिला ने आशंका जताई है कि बच्ची की पहचान और विवरण इस तरह सार्वजनिक होने से उसके भविष्य और सामाजिक प्रतिष्ठा पर भारी असर पड़ सकता है।साक्ष्य सुरक्षित रखने और निष्पक्ष जाँच की अपील
पीड़िता का स्पष्ट कहना है कि वह बिना जाँच किसी भी अधिकारी को दोषी घोषित नहीं करना चाहती, लेकिन सच सामने लाने के लिए जरूरी है कि वर्तमान अधिकारियों के सीधे नियंत्रण और प्रभाव से मुक्त एक जाँच कमेटी बनाई जाए। उसने मांग की है कि मामले से जुड़ी तमाम नोटशीट, फाइलें, आदेशों की प्रतियां, पत्राचार और डिजिटल रिकॉर्ड को तत्काल प्रभाव से सुरक्षित किया जाए ताकि साक्ष्यों के साथ कोई छेड़छाड़ न हो सके। साथ ही यह तय किया जाए कि पूरी कार्रवाई किसके निर्देश पर शुरू हुई थी।
तीन प्रमुख सवाल जिनके जवाब मिलना जरूरी
राष्ट्रीय आयोग से दखल की मांग
मामले में प्रशासनिक अनियमितता के साथ-साथ महिला और बाल अधिकारों का सीधा उल्लंघन होने का दावा किया गया है। इसे देखते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) से भी मामले में संज्ञान लेने का अनुरोध किया गया है ताकि बच्ची की संवेदनशील जानकारी का अनावश्यक प्रसार रोका जा सके।
अधिकारियों की चुप्पी , क्या कहते है विभागीय नियम
सरकारी सेवा नियमों के मुताबिक, किसी भी कर्मचारी के पारिवारिक मामलों में तब तक विभागीय दखल नहीं दिया जा सकता, जब तक उसका असर कार्यालयीन कामकाज पर न पड़ रहा हो। आरोप है कि इस मामले में नियमों को दरकिनार कर जानबूझकर परेशान करने की नीयत से कार्रवाई शुरू की गई। आरोपी अधिकारियों की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक जवाब नहीं दिया गया है।