अटैच शिक्षक रिलीव नहीं हो रहे, स्कूलों में पढ़ाई पर पड़ रहा असर, वेतन की फाइलें भी कार्यालय में अटकीं
बिलासपुर। जिले का शिक्षा विभाग पिछले आठ दिनों से बिना किसी जिम्मेदार अधिकारी के चल रहा है। हाई कोर्ट द्वारा प्रभारी डीईओ की नियुक्ति पर रोक लगाए जाने के बाद से यह पद खाली है। राज्य शासन ने अब तक न तो किसी को नया डीईओ बनाकर भेजा है और न ही किसी अन्य अधिकारी को इसका प्रभार सौंपा है। हालात इतने खराब हैं कि कार्यालय के चार सहायक संचालकों में से तीन छुट्टी पर चले गए हैं। ऐसे में पूरे शिक्षा विभाग का भार केवल एक सहायक संचालक के भरोसे टिका है। इस प्रशासनिक लेटलतीफी का असर रोजमर्रा के कामकाज पर दिखने लगा है। कर्मचारियों के वेतन और स्थापना की फाइलें कार्यालय में ही अटक गई हैं।
संचालनालय के पांच पत्रों के बाद भी नहीं हुए रिलीव
लोक शिक्षण संचालनालय की ओर से अब तक पांच पत्र भेजे जा चुके हैं, जिनमें अटैच शिक्षकों और कर्मचारियों को तत्काल रिलीव करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके बावजूद इन आदेशों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है। बिना डीईओ के इन शिक्षकों को उनके मूल पदस्थापना पर नहीं भेजा जा रहा है, जिससे स्कूलों में पढ़ाई प्रभावित हो रही है। कार्यालय में पदस्थ सहायक संचालक पी. दासरथी और अजय कौशिक पहले से ही छुट्टी पर चल रहे हैं। तीसरे सहायक संचालक बसंत प्रताप सिंह भी टाइफाइड के कारण मेडिकल लीव पर हैं। ऐसे में कार्यालय में फिलहाल सिर्फ सहायक संचालक वर्षा शर्मा ही मौजूद हैं और वही काम देख रही हैं।
अधिकार को लेकर असमंजस
सहायक संचालक वर्षा शर्मा का कहना है कि उनके पास अटैच शिक्षकों को रिलीव करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि वे डीईओ के प्रभार में नहीं हैं। जबकि विभाग के जानकारों का कहना है कि 3 जुलाई को तत्कालीन डीईओ रामेश्वर जायसवाल ने जो कार्य विभाजन आदेश जारी किया था, उसके तहत स्थापना का जिम्मा वर्षा शर्मा के पास ही है। उस आदेश में उन्हें स्कॉलरशिप, सेजेस, पीएम श्री, आरटीई, टीएल, जनदर्शन, स्टोर और बजट जैसे सेक्शन दिए गए थे। वहीं बसंत प्रताप सिंह को योजना, विधानसभा, कोर्ट, शिकायत जांच, अनुदान मान्यता, ऑडिट और एमडीएम का प्रभार मिला था। जानकारों के अनुसार, इस कार्य विभाजन के आधार पर शिक्षकों को रिलीव करने का अधिकार वर्षा शर्मा के पास है।
नियुक्ति पर रोक, 3 अगस्त को अगली सुनवाई
यह स्थिति तब बनी जब रामेश्वर जायसवाल को प्रभारी डीईओ बनाया गया। इस नियुक्ति के खिलाफ डॉ. राघवेंद्र कुमार गौराहा और कामेश्वर बैरागी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में बताया गया कि राज्य सरकार ने अपने ही पूर्व परिपत्रों और नियमों का उल्लंघन करते हुए एक जूनियर अधिकारी को प्रभारी डीईओ नियुक्त कर दिया। 10 जुलाई को हुई सुनवाई में हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया इस नियुक्ति को पुराने परिपत्रों के विपरीत माना और 10 जून 2026 के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी। अब इस मामले की अगली सुनवाई 3 अगस्त को होनी है।
काम नहीं रुकेगा, सहायक संचालक का रवैया समझ से परे: जॉइंट डायरेक्टर
विभाग में कामकाज ठप होने के मामले में स्कूल शिक्षा विभाग के जॉइंट डायरेक्टर अश्वनी भारद्वाज ने स्थिति स्पष्ट की है। उनका कहना है कि यदि डीईओ या प्रभारी डीईओ नहीं हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि विभाग का काम रुक जाएगा। जॉइंट डायरेक्टर ने कहा कि सहायक संचालक द्वारा अटैच शिक्षक और कर्मचारियों को रिलीव नहीं किया जाना समझ से परे है। उन्होंने यह भी बताया कि इस संबंध में सहायक संचालक ने उनसे कोई चर्चा भी नहीं की है।