Supreme Court: देशभर की जिला और तालुका अदालतों में महिला वकीलों के लिए बुनियादी सुविधाओं की कमी पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालतों में ऐसा माहौल बनाया जाना चाहिए, जहां महिला वकील सुरक्षित, सम्मानजनक और बराबरी के आधार पर अपनी जिम्मेदारियां निभा सकें।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा, “जरा सोचिए, हमारी बेटियां कितनी दयनीय परिस्थितियों में काम कर रही हैं।” कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से सभी राज्यों की तालुका अदालतों में महिला वकीलों के लिए शौचालय, पेयजल और अन्य जरूरी सुविधाओं की वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट तलब की है। साथ ही सभी राज्यों के एडवोकेट जनरल को दो सप्ताह के भीतर जमीनी स्तर पर जांच कर रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिपोर्ट मिलने के चार सप्ताह के भीतर जहां महिला शौचालयों की आवश्यकता है, वहां निर्माण कार्य शुरू होना चाहिए। इसके लिए लोक निर्माण विभाग (PWD) को जिम्मेदारी सौंपने की बात कही गई है। कोर्ट ने कहा कि फंड की कमी का बहाना स्वीकार नहीं किया जाएगा, क्योंकि यह महिलाओं के सम्मान और बुनियादी मानव अधिकारों का मामला है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि संसाधनों की जरूरत पड़े तो सरकार शराब और सिगरेट जैसे उत्पादों पर अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (Excise Duty) लगाने जैसे विकल्पों पर विचार कर सकती है। उनका कहना था कि महिला वकीलों को सम्मानजनक कार्यस्थल उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
यह मामला अधिवक्ता सारिका त्यागी और देशभर की महिला वकीलों के एक समूह द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ताओं ने विभिन्न राज्यों की अदालतों का दौरा कर महिला वकीलों के लिए उपलब्ध सुविधाओं की रिपोर्ट तैयार की थी, जिसे 19 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया। रिपोर्ट में कई अदालतों में महिलाओं के लिए अलग शौचालय और अन्य आवश्यक सुविधाओं के अभाव का उल्लेख किया गया था।