नई दिल्ली। Jantar Mantar Violence: राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर और संसद मार्ग पर 20 जुलाई को हुई हिंसा को लेकर जांच लगातार आगे बढ़ रही है। करीब दो सप्ताह बीत जाने के बाद भी इस मामले के कई सवाल अब तक अनसुलझे हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह हिंसा अचानक प्रदर्शनकारियों के गुस्से का परिणाम थी या फिर इसके पीछे पहले से तैयार की गई कोई सुनियोजित साजिश थी। दिल्ली पुलिस अब इस पूरे घटनाक्रम की जांच केवल कानून-व्यवस्था भंग होने की घटना के रूप में नहीं, बल्कि संभावित आपराधिक साजिश के एंगल से भी कर रही है। पुलिस का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही यह साफ हो पाएगा कि भीड़ स्वतः उग्र हुई थी या फिर हिंसा की योजना पहले से तैयार की गई थी।

जांच एजेंसियां इस समय सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, फेस रिकॉग्निशन सिस्टम (FRS), सोशल मीडिया गतिविधियों, डिजिटल फॉरेंसिक और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के आधार पर पूरे घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ने में जुटी हैं। पुलिस ने अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं की है। 20 जुलाई को हिरासत में लिए गए करीब 70 लोगों से पूछताछ के बाद उन्हें छोड़ दिया गया था। अब जांच का फोकस उन लोगों तक पहुंचने पर है, जिन्होंने कथित तौर पर हिंसा भड़काने, भीड़ को दिशा देने और पुलिस पर हमले में भूमिका निभाई।
पुलिस के अनुसार, 20 जुलाई को ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के बैनर तले बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर पर एकत्र हुए थे। प्रदर्शन के बाद भीड़ ने संसद की ओर मार्च करने की कोशिश की। उस समय संसद का मानसून सत्र चल रहा था और सुरक्षा के मद्देनज़र पूरे क्षेत्र में बीएनएसएस की धारा 163 लागू थी। जंतर-मंतर और संसद के आसपास के इलाके को 15 सुरक्षा जोन में बांटा गया था और प्रत्येक जोन की जिम्मेदारी डीसीपी रैंक के अधिकारी को सौंपी गई थी। संसद की सुरक्षा को देखते हुए पुलिस ने कई स्तर की बैरिकेडिंग की थी, लेकिन प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने बैरिकेड हटाने और आगे बढ़ने की कोशिश की। इसी दौरान दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ा और देखते ही देखते स्थिति हिंसक हो गई।

दिल्ली पुलिस का दावा है कि कुछ लोगों ने पुलिसकर्मियों पर पथराव शुरू कर दिया, जिसके बाद हालात तेजी से बिगड़ गए। कई जगह सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया, बैरिकेड तोड़े गए और वाहनों में तोड़फोड़ की गई। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने पहले समझाने का प्रयास किया, लेकिन स्थिति काबू से बाहर होने पर लाठीचार्ज किया गया। इसके बाद आंसू गैस के गोले छोड़े गए और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की ओर से पेलेट गन का भी इस्तेमाल किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी घायल हुए।
सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक हालात इतने गंभीर हो गए थे कि कुछ प्रदर्शनकारी संसद भवन के प्रवेश द्वार के बेहद करीब तक पहुंच गए थे। इसके बाद संसद परिसर में तैनात केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) के जवानों को भी हथियारों के साथ हाई अलर्ट पर तैनात कर दिया गया था, ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके। हालांकि देर शाम तक पुलिस ने जंतर-मंतर और संसद मार्ग को खाली करा लिया था, लेकिन इसके बावजूद हिंसा पूरी तरह नहीं थमी।
पुलिस के अनुसार, 21 जुलाई से 25 जुलाई के बीच कनॉट प्लेस, जनपथ और आसपास के कई इलाकों में पुलिसकर्मियों को निशाना बनाकर हमले किए गए। इन घटनाओं में इंस्पेक्टर नंदकिशोर, एसीपी विवेक भगत, एसीपी रोहित और एसीपी कैलाश बिष्ट सहित कई वरिष्ठ अधिकारी घायल हुए। दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के अनुसार इस पूरे घटनाक्रम में करीब 250 पुलिसकर्मी घायल हुए।
हिंसा के दौरान सरकारी संसाधनों को भी भारी नुकसान पहुंचा। पुलिस के मुताबिक 100 से अधिक बैरिकेड क्षतिग्रस्त हुए, 300 से ज्यादा बॉडी प्रोटेक्टर खराब हुए, 350 से अधिक हेलमेट टूट गए, 50 से ज्यादा दंगा-रोधी शील्ड क्षतिग्रस्त हुईं, 20 से अधिक लाउड हेलर खराब हुए और 25 से ज्यादा सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचा।
इस पूरे मामले में दिल्ली पुलिस ने 20 से अधिक एफआईआर दर्ज की हैं। इनमें 14 एफआईआर दंगा, हिंसा और विरोध प्रदर्शन से जुड़ी हैं। इसके अलावा प्रतिबंधित क्षेत्र में ड्रोन उड़ाने, पत्रकारों और सरकारी कर्मचारियों पर हमला करने सहित कई अन्य मामलों में भी अलग-अलग प्रकरण दर्ज किए गए हैं। आरोपियों पर दंगा, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, हत्या के प्रयास, पुलिस पर हमला, संसद की सुरक्षा में सेंध लगाने की कोशिश, आपराधिक साजिश और अन्य गंभीर धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए हैं।
जांच के दौरान दिल्ली पुलिस ने फेस रिकॉग्निशन सिस्टम (FRS) की मदद से 2,873 लोगों की पहचान करने का दावा किया है। पुलिस के अनुसार इनमें से 989 लोगों का पहले से आपराधिक रिकॉर्ड है। पुलिस का कहना है कि इन लोगों के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, डकैती, लूट, दुष्कर्म, पॉक्सो एक्ट, महिलाओं से छेड़छाड़, आर्म्स एक्ट, स्नैचिंग, अपहरण और एनडीपीएस एक्ट जैसे गंभीर मामलों में पहले से मुकदमे दर्ज हैं। कई ऐसे लोग भी चिन्हित किए गए हैं जिनके खिलाफ दो, पांच या दस से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं।
जांच एजेंसियां अब उन लोगों की भी तलाश कर रही हैं जो हिंसा के दौरान चेहरे पर मास्क पहनकर पहुंचे थे। पुलिस का कहना है कि करीब 400 सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली जा रही है और अलग-अलग वीडियो को जोड़कर पूरे घटनाक्रम का क्रमवार विश्लेषण किया जा रहा है। प्रारंभिक जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ लोग हाईटेक फेस मास्क, सेफ्टी गॉगल्स और अन्य सुरक्षात्मक उपकरण पहनकर आए थे, जिससे उनकी पहचान करना मुश्किल हो गया।
दिल्ली पुलिस की साइबर यूनिट सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और कुछ यूट्यूब चैनलों की भी जांच कर रही है। पुलिस का दावा है कि कुछ सोशल मीडिया हैंडल के जरिए अफवाहें फैलाने, लोगों को उकसाने और प्रदर्शन के दौरान भीड़ को निर्देश देने का प्रयास किया गया। डिजिटल फॉरेंसिक टीम मोबाइल फोन, चैट, वीडियो, लोकेशन हिस्ट्री और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की भी जांच कर रही है। कुछ यूट्यूब चैनलों और कंटेंट क्रिएटर्स की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक, जांच एजेंसियां इस पूरे घटनाक्रम में कुछ राजनीतिक संगठनों और अन्य समूहों की संभावित भूमिका की भी पड़ताल कर रही हैं। हालांकि, इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं आया है। पुलिस का कहना है कि सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच की जा रही है और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।
फिलहाल दिल्ली पुलिस की नजर उन लोगों पर है जो घटना के बाद से फरार बताए जा रहे हैं या सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए हैं। सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, फेस रिकॉग्निशन और अन्य डिजिटल सबूतों के आधार पर उनकी पहचान की जा रही है। माना जा रहा है कि जांच पूरी होने के बाद बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां और पूरक चार्जशीट दाखिल की जा सकती हैं।
हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि जांच अभी जारी है। हिंसा के पीछे वास्तविक कारण, कथित साजिश की पुष्टि और किसी भी व्यक्ति या संगठन की भूमिका का अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने तथा अदालत में पेश किए जाने वाले साक्ष्यों के आधार पर ही तय होगा।