CG | Sun, 12 July 2026

No Ad Available

Ikka Review: सनी देओल की दहाड़ और अक्षय खन्ना का दमदार अंदाज़ भी नहीं बचा पाए फिल्म, कमजोर कहानी ने किया निराश

11 Jul 2026 | WEENEWS DESK | 4 views
Ikka Review: सनी देओल की दहाड़ और अक्षय खन्ना का दमदार अंदाज़ भी नहीं बचा पाए फिल्म, कमजोर कहानी ने किया निराश

मुंबई। Entertainment: सनी देओल और अक्षय खन्ना जैसे दमदार कलाकार जब एक ही फिल्म में नजर आएं, तो दर्शकों की उम्मीदें स्वाभाविक रूप से काफी बढ़ जाती हैं। लेकिन ‘इक्का’ उन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती। कागज पर शानदार दिखने वाला यह कोर्टरूम ड्रामा पर्दे पर आते-आते अपनी चमक खो देता है। फिल्म में दमदार कलाकार तो हैं, लेकिन कमजोर पटकथा और साधारण निर्देशन के कारण यह एक औसत फिल्म बनकर रह जाती है।

कहानी

फिल्म की कहानी सोमा मित्तल (आकांक्षा रंजन कपूर) के इर्द-गिर्द घूमती है। एक रात वह प्रभावशाली नेता के बेटे शौर्यमान गौर (अक्षय खन्ना) के साथ पार्टी करती है। अगले ही दृश्य में वह गंभीर रूप से घायल अवस्था में सड़क किनारे मिलती है। एक चश्मदीद गवाह के आधार पर शौर्यमान को गिरफ्तार कर लिया जाता है।

मामला तब दिलचस्प मोड़ लेता है जब शौर्यमान अपनी पैरवी के लिए मशहूर वकील अर्जुन मेहरा उर्फ ‘इक्का’ (सनी देओल) का नाम लेता है। अर्जुन पहले यह केस लेने से साफ इनकार कर देता है, लेकिन उसी दिन उसकी बेटी को कैंसर होने का पता चलता है और इलाज के लिए जिस बोन मैरो डोनर की जरूरत होती है, वह शौर्यमान ही निकलता है। मजबूरी में अर्जुन को उसी व्यक्ति का केस लड़ना पड़ता है, जिसे वह दोषी मानता है।

कोर्टरूम ड्रामा कम, स्टारडम ज्यादा

फिल्म की शुरुआत एक मजबूत कोर्टरूम थ्रिलर का एहसास कराती है, लेकिन धीरे-धीरे कहानी सुविधाजनक घटनाओं और कमजोर मोड़ों पर निर्भर हो जाती है। अदालत की कानूनी लड़ाई से ज्यादा फिल्म अपने दोनों सितारों की स्क्रीन प्रेजेंस को दिखाने में व्यस्त नजर आती है। निर्देशक सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ने कोर्टरूम के तनाव को मजबूत बनाने के बजाय कई ऐसे दृश्य रखे हैं, जहां सनी देओल टेबल थपथपाते और ऊंची आवाज में संवाद बोलते दिखाई देते हैं, जबकि अक्षय खन्ना को रहस्यमयी अंदाज में पेश किया गया है।

अक्षय खन्ना पर ‘धुरंधर’ की छाप

अक्षय खन्ना का अभिनय प्रभावशाली जरूर है, लेकिन उनका किरदार काफी हद तक उनकी पिछली फिल्म ‘धुरंधर’ के रेहमान डकैत की याद दिलाता है। उनका लुक, बॉडी लैंग्वेज और स्क्रीन प्रेजेंस लगभग वैसा ही महसूस होता है। यहां तक कि हत्या के आरोपी की कोर्ट में स्लो-मोशन एंट्री और बैकग्राउंड म्यूजिक कई जगह बनावटी लगता है।

अभिनय

सनी देओल फिल्म में एक नामी वकील की भूमिका निभाते हैं, लेकिन फिल्म यह साबित नहीं कर पाती कि उनका किरदार इतना बेहतरीन वकील क्यों माना जाता है। एक पिता के भावनात्मक संघर्ष को भी वह पूरी तरह प्रभावशाली नहीं बना पाते। अक्षय खन्ना अपने अनुभव के दम पर किरदार को संभालने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर लेखन उनके प्रदर्शन को सीमित कर देता है। दिया मिर्जा एक बार फिर मां की भूमिका में नजर आती हैं और अपने छोटे से रोल में प्रभाव छोड़ती हैं। वहीं तिलोत्तमा शोम जैसी शानदार अभिनेत्री को भी बेहद कमजोर और अधूरा किरदार मिला है। कहानी की सबसे अहम कड़ी होने के बावजूद आकांक्षा रंजन कपूर के हिस्से में भी ज्यादा कुछ नहीं आता।

निर्देशन

सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा फिल्म को एक रोमांचक कोर्टरूम थ्रिलर बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर पटकथा, अनुमानित ट्विस्ट और सतही कोर्टरूम बहसें फिल्म को साधारण बना देती हैं। क्लाइमेक्स भी दर्शकों पर कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ता।

अंतिम फैसला

‘इक्का’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें शानदार स्टारकास्ट होने के बावजूद दमदार कहानी का अभाव साफ नजर आता है। कोर्टरूम ड्रामा होने के बावजूद फिल्म न तो कानूनी लड़ाई में रोमांच पैदा कर पाती है और न ही भावनात्मक स्तर पर दर्शकों को जोड़ पाती है। अगर पटकथा और संवादों पर ज्यादा मेहनत की जाती, तो यह एक बेहतरीन थ्रिलर बन सकती थी। अगर आप सिर्फ सनी देओल और अक्षय खन्ना के फैन हैं तो एक बार देख सकते हैं, लेकिन एक शानदार कोर्टरूम थ्रिलर की उम्मीद लेकर जाएंगे तो शायद निराशा हाथ लगे।


WEENEWS DESK
WEENEWS DESK

Join WhatsApp


❌ No active feeds found.